आपकी कलम से

आपकी कलम से

कोरोना काल मे स्वदेशी निर्भरता

कोरोना काल एक भयानक त्रासदी है जो हमारे ही पडोसी देश चीन की देन है। कोरोना ने जनजीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है। चारो तरफ हाहाकार है । पर इसका एक सुखद पहल यह भी है की प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार के साथ है । और चीन से घृणा जन – जन मे फैलने से सभी लोग उसके साथ कोई भी संबंध रखने को तैयार नहीं है । यह स्वदेशी निर्भरता की तरफ बढ़ते कदमो की आहट है । क्योंकि अभी तक हम अधिकतर चीजों के लिए चीन पर निर्भर है। लेकिन जब हम उसका विरोध करने को तैयार है तो हमे उस पर निर्भरता को खत्म करना होगा और स्वतः ही उन सभी उत्पादों का निर्माण करना होगा। जो हम चीन से आयत करते है । साधारण जीवन जीने के लिए हम आत्मनिर्भर है क्योंकि हम जानते है कि स्वंम मे समर्थ है की चीन के सामान के बिना भी हम अपना जीवन अच्छे प्रकार जी सकते है। युवा वर्ग भी आर्गेनिक खेती कि तरफ कदम बढ़ा चुका है। क्योंकि वो भी अपनी शक्ति और सामर्थ्य को पहचान चुका है। कोरोना काल ने हमे सीखा दिया है कि काम संसाधनों
अभिनव सिंधु की कलम से… ।

प्राइवेट स्कूलो को फीस न देने का प्रचार आंदोलन का स्वरुप देने वालो को एक सन्देश !

…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….. प्रिय अभिभावकों इस सन्देश मे सरकारी , गैरसरकारी देनदारी न देने के लिए हर व्यक्ति किसी न किसी रूप मे समर्थन करता है । परन्तु तार्किक सुझाव क्यों नहीं देते ? फीस माफ़ क्यों कराना चाहते है। 1. क्या स्कूलों ने समस्त स्टाफ कि छुट्टी कर दी ? क्या उन्हें नौकरी या वेतन कि आवश्यकता नहीं है । क्या कोरोना काल मे उन शिक्षकों / कर्मचारियों ने कोई और व्यवसाय कर लिया। उनकी आजीविका कैसे चलेगी? 2. स्कूलों ने ट्रांसपोर्ट, डीजल, पेट्रोल के अतिरिक्त क्या बचत कि है ? इन प्रश्नो का निराकरण भी तो अभिभावक और उनके समर्थक बताये। देश के नागरिको को सरकार ने क्या – क्या सुविधाएं दे दी है। क्या कोरोना देशवासियो ने फैलाया है। हर चीज कि कीमते आसमान छू रही है। क्या किराने के सामान कि कीमते कम हो गयी ? क्या बैंको से जिन्होंने लोन लिया है। उनकी किश्ते माफ़ हो गयी है ? किश्त अभी नहीं देनी पड़ेगी। फिर मात्र शिक्षण संस्थाए ही क्यों निशाने पर है। जब हर चीज वास्तविक मूल्य से महंगी हो चुकी है। तो क्यों स्कूलों को पुरानी दरों पर भी फीस लेने का अधिकार नहीं है। स्कूलों कि बिल्डिंग कोविड – 19 के लिए इस्तेमाल की जा रही है। प्रधानमंत्री केयर फंड मे स्कूलों व स्टाफ का दिया गया दान कोरोना महामारी काल मे स्कूलों का सहयोग व सहभागिता नहीं है। फिर फीस न देने का क्या कारण है। अंजू सिंह प्रधानाध्यपिका ग्लोबल विजडम एकेडमी
अंजू सिंह की कलम से… ।

भारतीय शिक्षा प्रणाली !

भारतीय शिक्षा प्रणाली काफी पुरानी शिक्षा प्रणाली है जो अभी भी मौजूद है। इसने इतने प्रतिभाशाली दिमागों का उत्पादन किया है जो पूरे विश्व में भारत को गौरवान्वित कर रहे हैं। हालाँकि, जबकि यह सबसे पुरानी प्रणालियों में से एक है, यह अभी भी दूसरों की तुलना में विकसित नहीं है, जो वास्तव में नए हैं। ऐसा तब है जब अन्य देश विकास और उन्नति से गुजरे हैं, लेकिन भारतीय शिक्षा प्रणाली अभी भी बुढ़ापे में अटकी हुई है। यह बहुत सारी समस्याओं का सामना करता है जिन्हें इसे अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए हल करने की आवश्यकता होती है। हमारी भारतीय शिक्षा प्रणाली बहुत सी समस्याओं का सामना करती है जो इसे समृद्ध नहीं होने देती हैं और अन्य बच्चों को जीवन में सफल होने में मदद करती हैं। सबसे बड़ी समस्या जिसका सामना करना पड़ता है वह है खराब ग्रेडिंग प्रणाली। यह शिक्षाविदों के आधार पर एक छात्र की बुद्धिमत्ता का न्याय करता है जो परीक्षा के प्रश्नपत्र के रूप में होता है। यह उन छात्रों के लिए बहुत अनुचित है जो अपने समग्र प्रदर्शन में अच्छे हैं, लेकिन विशिष्ट विषयों में अच्छे नहीं हैं। इसके अलावा, वे केवल अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए प्रयास करते हैं जो कि पढ़ाए गए ज्ञान पर ध्यान नहीं देते हैं। दूसरे शब्दों में, यह मगिंग के माध्यम से अच्छे अंक प्राप्त करने को प्रोत्साहित करता है और वास्तव में इस अवधारणा को कुशलता से समझ नहीं पाता है।
मुकुल सिंघल की कलम से… ।

भारत का मीडिया !

भारतीय जनसंचार माध्यमों में जनसंचार माध्यमों के कई अलग-अलग प्रकार के संचार होते हैं: टेलीविजन, रेडियो, सिनेमा, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ और इंटरनेट-आधारित वेबसाइट / पोर्टल। 18 वीं शताब्दी के अंत से भारतीय मीडिया सक्रिय था। भारत में प्रिंट मीडिया की शुरुआत 1780 में हुई थी। 1927 में रेडियो प्रसारण शुरू हुआ। भारतीय मीडिया दुनिया में सबसे पुराना है। यह अशोक के शासनकाल से भी पहले का है। भारत में मीडिया अपने पूरे इतिहास में स्वतंत्र और स्वतंत्र रहा है। हालांकि, ऐसे समय भी आए हैं जब इसकी नकल की गई थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल की अवधि (1975-1977) वह संक्षिप्त अवधि थी जब भारत के मीडिया को संभावित प्रतिशोध का सामना करना पड़ा था
अदिति शर्मा की कलम से… ।

भारत का मीडिया !

भिंगी पलकों में चमकती मुस्कान देखी,जैसे रेत के समंदर में गुलशन देखी. आज के आँखों में, कल की तस्वीर देखी , जैसे हांथो की लकीरों में तकदीर दिखी. खामोश लबों पे पढ़ी कहानी देखी, जैसे सुखे गुलाब में एक बून्द दिखी. शांत चेहरे पे कुछ लकीरें देखी, जैसे गहरे सागर में कुछ लहरें देखी | सदियों के फसलों में क़रीबी देखी, जैसे संग चलते कोई परछाई देखी | अनछुए जस्बातों के महफिल देखी,जैसे भीड़ में घूम कोई तन्हाई देखी |
अदिति शर्मा की कलम से… ।

कविता !

एक रहस्य है जिंदगानी , एक सांस आनी और फिर है जानी.
जो समझे इसे वो ज़िले एक पल मे पूरी जिंदगानी.
एक आंख से रोना दूजे से ख़ुशी दिखानी.
दूजे के मुस्कान मैं ख़ुदकी ख़ुशी है सजानी.
गुजारा वक्त भी लौट आएगा बस एक आवाज़ है लगानी.
मंजिलों की चाह में क़दमे रास्तों की दीवानी.
हौसला कम ना हो इसलिए रखना हर चाल मस्तानी.
अंधेरे भी घुल जायेंगे बस जलाये रखना चांदनी.
छोटी सी है ये कहानी अपनाओ तो है अपनी वरना है अनजानी. ।
अनु की कलम से…

Structural Change – Need of the hour

high time when a structural change is required everywhere. So that the young talent should survive and prosper as talent build up the national asset. The acknowledge institution like facilities school and universities should take the lead by teaching new brain what it means to report issues and talent . it`s high time when we should consider it as our responsibility to in calcite the culture which is followed in developed cowries the talent is acknowledged there. Apparently children should be made. More equipped with emotional quotient and better communication skills to save their lives from this blood sucking system. I wish to see the structural change covering up top soon without sacrificing more lives that too because we are net yet ready for the change. Ritu Singh (PGT Economics) K.L. International ।
ऋतु सिंह की कलम से…

कविता

ज़िन्दगी से बड़ी कोई सजा ही नहीं…
और क्या जुर्म है ये पता नहीं…!!!
इतने हिस्सों मैं बट गया हूँ मैं…
मेरे हिस्से मैं कुछ बचा ही नहीं ….

अशोक की कलम से…

कविता

कुछ सवालों को सवाल ही रहने दे ग़ालिब, क्या पता जवाब दूर न कर दे तुमको हमसे…
बस अब इस क्व्वाब मैं जीने दो मुझे …न कहो मुझसे मेरी आँखों खोल दो …
क्या पता जब खुल जाये ये आँखें तो ये कहीं खवाब न बन जाये …!!!

गुमनाम की कलम से…

कविता

शतरंज सी जिन्दगी में, !
कौन किसका मोहरा है… !
आदमी एक है, !
मगर सबका किरदार दोहरा है…!!

किशोर की कलम से…

कविता

मौन है दुनिया की, शायद उसके पास सवालों का जवाब नहीं.
चोलो पूछते हैं यही सवाल हवाओं से, की इन्हे किसी का डर नहीं.
जबाब में बेधड़क हवाओं ने कहा, पूछते हो सावल क्या ज़माने का डर नहीं.
हमने कहा ज़माने से तो टकरा लेंगे, की अब ज़माने में वो ताकत नहीं.
हवाओं ने कहा यही फितरत हैं ज़माने की, बह जाते हैँ हवा संग, हवा के खिलाफ बहने की इनमे हिम्मत नहीं.

अनु की कलम से…
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